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| looser 33 |
............ कभी -कभी बच्चों को दिया गया extra care और protection उनके भविष्य के लिए poisonous प्रभाव पैदा करता है। वो उस माहौल के आदी हो जाते है और उससे निकलना उनके लिए काफी मुश्किल होता है जिसके कारन उनकी लाइफ में काफी परेशानिया आती है।
..... दीपावली का त्योहार मेरे लिए क़ाफी महत्व रखता था। एक हफ्ता पहले से ही मैं पटाखे छुड़ाने लगता था। दिवाली के दिन लक्ष्मी -गणेश जी की पूजा के बाद दीये निकालते ,मोमबत्ती लगाते फिर पटाख़े छुड़ाते थे जिसका बेसब्री से इंतज़ार रहता था। काफी देर तक पटाखे चलाने के बाद हम लोग खीला , लाई ,खिलौना और मिठाई खाते थे. मुझे तरह- तरह मिठाइयाँ खाना काफी पसंद था खास तौर पर रसगुल्ला जो दिवाली पर हरा ,पीला ,लाल ,सफ़ेद और नारंगी रंग के मिलते थे। बचपन मेरा हरदोई (hardoi ) मेँ काफी अच्छा बीता।
those are golden days !
स्कूल के दिन भी काफी अच्छे थे सुबह 7 .बजे से स्कूल शुरू था बच्चों को सुबह जगाने में लोगो को काफी परेशानी होती है पर मुझे कोई परेशानी नहीं थी मम्मी जल्दी से टिफ़िन तैयार कर देती थी। फिर मुझे तैयार करती। फिर एक आदमी मुझे लेकर स्कूल रिक्शा पर छोड़ने जाता था। पापा रेलवे में o.s. थे अतः उन्हें घर के कार्य के लिया servant प्राप्त थे उन्ही में से एक आदमी मुझे रिक्शा पर छोड़ने जाता था। असली नाटक तो अब सुरु था। मुझे स्कूल जाने से बहुत डर लगता था अक्शर ही मैं कोई न कोई बहाना बनाकर स्कूल से छुट्टी ले लिया करता था। कभी पेट दर्द कभी कुछ । मुझे स्कूल से छुट्टी लेने में बहुत मजा आता था ।
स्कूल के बाहर एक चाट वाला बैठता था उसकी चाट बहुत टेस्टी होती थी अपनी पूरी जिंदगी में मैंने वैसी चाट नहीं खायी। बाकी बर्फ़ के गोले वो घिस के जो बर्फ़ को गिलास या दिया में रंग-बिरंगे शर्बत डाल कर तैयार करते है खाने में काफी मजा आता था। स्कूल के बाहर खाने को बहुत कुछ था पर मुझे कुछ चीजे ही पसंद थी और वो मेरे लिए ख़ास थी। कम्पट (orange toffy ) और हलवा जो transparent paper में लिपटा होता था मुझे काफी पसंद था।
पड़ोस में पापा के दोस्त रहते थे उनके बड़े लड़के देवेंद्र से मेरी अच्छी दोस्ती थी। मैं उसके छोटे भाई को काफी परेशांन करता था। बचपन में सभी बच्चे थोड़े -बहुत शैतान होते है मैं थोड़ा ज्यादा था।
एक बार हमने धर्मेंद्र की फिल्म देखी उसे धमेंद्र का एक्शन देखकर जोश आ गया मैंने बोला अगर तुममे दम है तो अपने कपडे फाड़ कर दिखाओ। वो बेचारा अपनी दम दिखने के चक्कर में अपने पापा के सामने खड़ा होकर बोला 'देखो पापा हम धर्मेन्द्र हो गए हम में बहुत ताकत है' अभी उसके पापा सोच ही रहे थे की क्या कह रहा है ,तब तक उसने अपने कपडे फाड़ दिए उसके पापा उसे डाटने लगे बोले 'सुअर ,नालायक अभी नए कपड़ें लाये थे ,उन्हें फाड़ दिया' वो बोला पापा ताकत देखो हमारी हम एकदम धर्मेन्द्र बन गए है '। हम सब हँसने लगे।
उसे हम लोग मिर्ज़ा ग़ालिब कहते थे उस समय मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल t.v. पर आता था। उसका असली नाम तो याद भी नहीं आ रहा। ऐसे ही एक बार उसने तोता पाला था ,मैंने उससे बोला पिजड़ा खोल दो तोता नाचेगा उस बेचारे ने पिजड़ा खोल दिया, और तोता उड़ गया। उसकी मम्मी उसे डांटने लगी पिजड़ा क्यों खोला उसने कहा 'मम्मी पिजड़ा खोलने पर तोता नाचता इसलिए खोला 'उसकी मम्मी ने अपना माथा पकड़ लिया। हम सब बहुत हँस रहे थे।
वाकई किसी को परेशान करने में बहुत मजा आता है ,लेकिन ये बचपन में ही अच्छा लगता है बड़े होने पर एहसास होता है की किसी को कितनी तकलीफ़ हुई होगी।
लेकिन बचपन की शैतानिया काफी मजेदार होती है ,ज्यादा नहीं पर थोड़ शैतान हर बच्चे को होना चाहिए।
those are golden days !
स्कूल के दिन भी काफी अच्छे थे सुबह 7 .बजे से स्कूल शुरू था बच्चों को सुबह जगाने में लोगो को काफी परेशानी होती है पर मुझे कोई परेशानी नहीं थी मम्मी जल्दी से टिफ़िन तैयार कर देती थी। फिर मुझे तैयार करती। फिर एक आदमी मुझे लेकर स्कूल रिक्शा पर छोड़ने जाता था। पापा रेलवे में o.s. थे अतः उन्हें घर के कार्य के लिया servant प्राप्त थे उन्ही में से एक आदमी मुझे रिक्शा पर छोड़ने जाता था। असली नाटक तो अब सुरु था। मुझे स्कूल जाने से बहुत डर लगता था अक्शर ही मैं कोई न कोई बहाना बनाकर स्कूल से छुट्टी ले लिया करता था। कभी पेट दर्द कभी कुछ । मुझे स्कूल से छुट्टी लेने में बहुत मजा आता था ।
स्कूल के बाहर एक चाट वाला बैठता था उसकी चाट बहुत टेस्टी होती थी अपनी पूरी जिंदगी में मैंने वैसी चाट नहीं खायी। बाकी बर्फ़ के गोले वो घिस के जो बर्फ़ को गिलास या दिया में रंग-बिरंगे शर्बत डाल कर तैयार करते है खाने में काफी मजा आता था। स्कूल के बाहर खाने को बहुत कुछ था पर मुझे कुछ चीजे ही पसंद थी और वो मेरे लिए ख़ास थी। कम्पट (orange toffy ) और हलवा जो transparent paper में लिपटा होता था मुझे काफी पसंद था।
पड़ोस में पापा के दोस्त रहते थे उनके बड़े लड़के देवेंद्र से मेरी अच्छी दोस्ती थी। मैं उसके छोटे भाई को काफी परेशांन करता था। बचपन में सभी बच्चे थोड़े -बहुत शैतान होते है मैं थोड़ा ज्यादा था।
एक बार हमने धर्मेंद्र की फिल्म देखी उसे धमेंद्र का एक्शन देखकर जोश आ गया मैंने बोला अगर तुममे दम है तो अपने कपडे फाड़ कर दिखाओ। वो बेचारा अपनी दम दिखने के चक्कर में अपने पापा के सामने खड़ा होकर बोला 'देखो पापा हम धर्मेन्द्र हो गए हम में बहुत ताकत है' अभी उसके पापा सोच ही रहे थे की क्या कह रहा है ,तब तक उसने अपने कपडे फाड़ दिए उसके पापा उसे डाटने लगे बोले 'सुअर ,नालायक अभी नए कपड़ें लाये थे ,उन्हें फाड़ दिया' वो बोला पापा ताकत देखो हमारी हम एकदम धर्मेन्द्र बन गए है '। हम सब हँसने लगे।
उसे हम लोग मिर्ज़ा ग़ालिब कहते थे उस समय मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल t.v. पर आता था। उसका असली नाम तो याद भी नहीं आ रहा। ऐसे ही एक बार उसने तोता पाला था ,मैंने उससे बोला पिजड़ा खोल दो तोता नाचेगा उस बेचारे ने पिजड़ा खोल दिया, और तोता उड़ गया। उसकी मम्मी उसे डांटने लगी पिजड़ा क्यों खोला उसने कहा 'मम्मी पिजड़ा खोलने पर तोता नाचता इसलिए खोला 'उसकी मम्मी ने अपना माथा पकड़ लिया। हम सब बहुत हँस रहे थे।
वाकई किसी को परेशान करने में बहुत मजा आता है ,लेकिन ये बचपन में ही अच्छा लगता है बड़े होने पर एहसास होता है की किसी को कितनी तकलीफ़ हुई होगी।
लेकिन बचपन की शैतानिया काफी मजेदार होती है ,ज्यादा नहीं पर थोड़ शैतान हर बच्चे को होना चाहिए।
.... मैंने कभी ब्लॉग नहीं लिखा ये मेरा पहला ब्लॉग है उम्मीद है लोगो को पसंद आएगा।
मेरी कहानी जो स्कूल तक पहुंच चुकी है। स्कूल के साथ -साथ मुझे कॉमिक्स पढ़ने का भी बहुत शौक़ था मेरी जैसे जान ही कॉमिक्स में थी।
यदि कोई कॉमिक्स फाड़ दे या मोड़ दे तो मेरी जान निकल जाती थी। डायमंड कॉमिक्स में चाचा चौधरी ,बिल्लू ,पिंकी ,रमन प्राण के ये चरित्र मुझे पसंद थे और फौलादी सिंह ,राजन-इक़बाल ,लम्बू-मोटू ,पलटू ,अँकुर भी मुझे काफी पसंद थे। अश्वनी आशू और प्राण काफी अच्छा लिखते थे एक रियल माहौल पैदा कर देते थे अपनी कलम से ,इधर मनोज कॉमिक्स में राम -रहीम, क्रुकबॉन्ड ,हवलदार बहादुर और बिमल चटर्जी द्वारा लिखित सभी कॉमिक्स मुझे काफी पसंद थे और राज कॉमिक्स में सुपर कमांडो ध्रुव ,नागराज ,बांकेलाल ,डोगा मुझे काफी पसंद थे।
यदि कोई कॉमिक्स फाड़ दे या मोड़ दे तो मेरी जान निकल जाती थी। डायमंड कॉमिक्स में चाचा चौधरी ,बिल्लू ,पिंकी ,रमन प्राण के ये चरित्र मुझे पसंद थे और फौलादी सिंह ,राजन-इक़बाल ,लम्बू-मोटू ,पलटू ,अँकुर भी मुझे काफी पसंद थे। अश्वनी आशू और प्राण काफी अच्छा लिखते थे एक रियल माहौल पैदा कर देते थे अपनी कलम से ,इधर मनोज कॉमिक्स में राम -रहीम, क्रुकबॉन्ड ,हवलदार बहादुर और बिमल चटर्जी द्वारा लिखित सभी कॉमिक्स मुझे काफी पसंद थे और राज कॉमिक्स में सुपर कमांडो ध्रुव ,नागराज ,बांकेलाल ,डोगा मुझे काफी पसंद थे।
सायद कोई होगा जिसने कॉमिक्स न पढ़ी हो और कॉमिक्स की fantasy दुनिया में न गया हो। अब तो कॉमिक्स लगभग बंद हो गए है। पर मेरी सोंच से बच्चों के लिए कॉमिक्स बहुत जरुरी है ये एक brain बूस्टर टॉनिक की तरह काम करता है ये हमारी सोचने -समझने की छमता को बढ़ने के साथ-साथ हमारी तार्किक बुद्धि को विकसित करता है जिससे हम शीघ्र निर्णय लेने में सछम हो जाते है साथ ही साथ हमारा मनोरंजन भी होता है जिससे हमारा दिमाग तरोताज़ा महसूस करता है।
कॉमिक्स पढ़ने के लिए मुझे काफी struggle करना होता था। मुझे घर से बहार जाने की इजाजत नहीं थी। मुझे इंतजार करना होता था की कब कोई भी खाली हो और मुझे लेकर रेलवे स्टेशन पर स्थित कॉमिक्स स्टॉल तक ले जाये जिससे मैं कॉमिक्स खरीद सकू। बीच में मैंने v.p. से भी कॉमिक्स मंगाई। मैंने किराये पर भी कॉमिक्स पढ़ी।
इस तरह से मैंने कॉमिक्स के शौक़ को पूरा किया।
that is start of my life ......
that is start of my life ......
story to be continue ........

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