looser ( to be continue ....)-3
होली का त्यौहार भी मेरे लिए काफी ख़ास था। पापा के साथ रंग लेने और पिचकारी लेने मैं ही जाया करता था। वो भी मुझे अलग -अलग तरह की पिचकारियां पसंद थी ,जैसे चिड़िया वाली जिसकी चोंच से रंग निकलता ,बंदूक वाली ,बैगन वाली ,टाई वाली आदि। बाद में पापा ने मुझे पीतल की पिचकारी भी दिलायी जिसमें हवा भरने पर रंग निकलता था।
मुझे लाल ,पीला ,नीला ,हरा रंग पसंद था। बाज़ार से गुझियाँ बनाने का तथा होली में जरुरी और भी सामान जैसे पापड़ , तरह -तरह की नमकीन लेने भी मैं ही साथ में जाया करता था। मुझे याद है होली के एक दिन पहले ही गुझियाँ बनने लगती थी देर रात तक गुझिया बनती थी जिसमे मैं भी मदद करता था। ढेर सारी गुझियाँ बनाती थी क्योंकी 'हरदोई' मेँ होली खेली एक दिन जाती थी लेकिन होली मिलने लोग 5 -6 दिन जाते थे।
सुबह से रंग पिचकारी में डाल कर इधर -उधर दौड़ना की कोई मिले तो उसके ऊपर रंग डाले फिर चाहें वो दोस्त हो या मौसेरे भाई - बहन। हम लोग रेलवे कॉलोनी में रहते थे वहा पर लोग मंडली बनाकर सुबह होली खेलने एक- दूसरे के घर जाया करते थे। गाते -बजाते बाड़ी धूमधाम के साथ मंडली हमारे घर पर भी आती थी। पापा के साथ रंग खेलते उनसे गले मिलते ,फिर गुझियाँ खाते ,और फिर अगले घर की ओर मंडली चली जाती।
रंग खेलने के बाद हम लोग रंग छुड़ाते और नहाते थे ,शाम को वहाँ गुलाल चलता था। लोग एक दूसरे के घर जाते गुलाल लगाते ,गले मिलते फिर बैठ कर गुझियाँ ,नमकीन खाते आपस में हँसी मज़ाक होता।
वो सब देख कर कितना अच्छा लगता था ,वो सुनहरा बचपन जो मम्मी - पापा ने दिया था उन्होंने हमारे बचपन को और भी special बना दिया था।
आज मम्मी और पापा दोनों हमारे बीच नहीं हैं पर ब्लॉग का ये पन्ना लिखते समय उनकी यादें ताज़ा हो गयी और मेरी आँख नम हो गयी।
वक़्त काफी परेशान था ,सुबह के 3. 30 से वो मुझे परेशान कर रहा था, वक़्त हो गया उठ जा तू वक़्त पे कुछ लिखना भूल गया है इस वक़्त ही लिख ले। तब ध्यान आया मैं कल ब्लॉग लिखना भूल गया था। वक़्त के इस इशारे को मैं नज़र अंदाज नहीं कर सकता था इसलिए मैंने 4 . 40 पर पर ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया।
जब आप' एक विकसित होते बच्चे पर उसकी safety के लिए अत्यधिक चितिंत होते हैं और उसकी safety के लिए उसके अकेले बाहर निकलने पर प्रतिबन्ध लगाते है , तो उसका अत्मविश्वास (self confidence ) कमजोर होता है ,उसका विकसित होता मानसिक स्तर उसके लिए एक सीमित दायरा बनाने लगता है की वो अकेले कुछ भी नहीं कर सकताहै न वो social हो सकता है अर्थात उसे समाज में घुलने -मिलने में परेशानी होती है , वो अकेले कही जा भी नहीं सकता क्यूंकि जब वो अकेले कहीं जा रहा होता है तो उसके दिमाग का self restriction जो परिस्थितियों अनुसार बना है उसे रोकता है ,उसे कुछ कमी सी लगाती है ,उसे अकेले जाने में डर भी लगता है ,उसे कुछ सीखने में भी परेशानी होती है क्यूंकि उसका परिस्थितियों अनुसार सीमित मानसिक दायरा उसे उस योग्य ना होने का एहसास करता है ,उसकी कुछ भी सीखने की इच्छा को दबाता है ,बहुत सी बात जो उसके मन में आती वो उन्हें दबाने लगता है बगैर किसी से कहे।
जब परिस्थितियों अनुसार उसका सीमित मानसिक दायरा उसके दिमाग का self restriction उसे कुछ सीखने नहीं देता तो वो बगैर कारण जाने वो सामाजिक उपहास का कारण बनता है ,जो उसके आत्मविस्वास को और गिरा देता है और वो अपनी life में कुछ भी करने से डरता है ,शायद इसी लिए मैं motorcycle चलाना नहीं सीख पाया और न ही मेरी सीखने की इच्छा हुई क्यूंकि मेरा self restriction मुझे रोकता था जिससे बहार निकलना बहुत मुश्किल है पर अब मैं कोशिश कर रहा हूँ और शायद ये सम्भव हो जाये की मैं मेरे self restriction zone से बहार निकल सकूँ।
किसी के looser होने का ये भी एक कारण है।
कहानी के पिछले भाग :--
looser-1
looser 2
story to be continue ......

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