looser ( to be continue ....)-4


looser ( to be continue ....)-4

                                                             
looser, loser, autobiography
looser 33
जिंदगी यूँ  चलती रहती है , और उसमे कहानियाँ बनती रहती हैं। आपकी  जिंदगी में जो घटनाये घटती हैं  वो एक दिन कहानियाँ बन जाती हैं।

 लूज़र  होने का दूसरा कारण ये भी है की एक बच्चे की सभी इच्छाएं पूरी होती रहे  जो वो खाना चाहता है और जो वो पहनना चाहता है ,जो वो खिलौने  चाहता है और साथ ही  जेब खर्च भी  मिलता रहे ,उसकी हर गलत- सही जिद पूरी होती रहे।उसकी जिंदगी  एक self  driving कार की तरह होती है जिसका कोई final  destination नहीं होता है। वो ये सोचने लगता है की ये सब मेरे साथ हमेंशा होता रहेगा।अतः उसे अब कुछ करने  की जरुरत भी नहीं होगी।
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        आभाव जिंदगी में जरूरी होते है यदि आप सछम  है  तो भी  आभाव पैैदा कीजिये ,गलत सही आप जान सकते हैं वो नहीं जो गलत है उसे कभी पूरा मत कीजिये उसे गलत सही समझाइए। जिससे उसके अंदर सही गलत की समझ पैदा होगी उसकी हर इच्छा एकदम से पूरी मत कीजिये उसे थोड़ा struggle  करने  दीजिये जिससे उसके अंदर struggle करने की भावना पैदा होगी, जो उसकी पूरी जिंदगी में किसी चीज़ को पाने में जो struggle होता है उसमे काफी हेल्प करता है।

  पापा और बड़े भाई के द्वारा मेरी हर इच्छा पूरी करने के कारन मेरे अंदर ये सोंच विकसित हो गयी की जिंदगी में सब कुछ बहुत आसानी से मिल  जाता है उसके लिए उन्हें कोई विशेष मेहनत नहीं करनी होती होगी।
पर मुझे क्या पता था की जो वो आज मुझे बहुत आसानी से दे - दे रहे है उसके लिए उन्हें पहले कितनी मेहनत  करनी पड़ी थी , उनकी जिंदगी में भी एक struggling  phase  था, जिसे पूरा करने के बाद ही कोई  सफल होता है।

सबकी जिंदगी में struggling  phase होता है, कोई इसे आसानी से पार कर लेता है, तो कोई कुछ तकलीफ़ो के साथ इसे पार कर ही लेता है।

  पर एक लूज़र ( जैसे की मैं ) के लिए इसे पार करना 100 मौत मरने के बराबर होता है। जब एक बारगी उसकी जिंदगी में struggling  phase आता है तो वो एक पहाड़ की तरह लगता जिसे पार करना उसके लिए नामुमकिन  होता है, उसे लगता है की वो अकेला है क्यूंकि हर काम उसे साथ करने की आदत होती है। पर  जिंदगी में struggling  phase सबको अकेले ही पार करना होता है।
   ये मेरा struggling  phase है।


 year 2000 में पापा रेलवे से रिटायर  गए और  हम लोग  'हरदोई'  छोड़कर  'शाहग़ंज ' आ गए।  हरदोई छोड़ते समय पापा के  दोस्त , स्टॉफ  के लोग, भैया के दोस्त, मेरे दोस्त, काफी दुःखी थे उनके अंदर जो लगाव था वो साफ़ नजर आ रहा था, काफी लोग रो भी रहे थे भैया के दोस्त विनय ने पूंछा गुड्डू( गुड्डू मेरा nickname  है)तुम्हे कुछ ख़राब नहीं लग रहा है, मैंने बोला नहीं तो। पर बाद में जब हम वहा से निकले तो हमे काफी खराब  लग रहा था।, ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ छूट गया था  आख़िर जन्मभूमि थी हरदोई मेरी उससे छूटने का दुःख तो होना ही था बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आँसू  रोक रखें  थे।

हम लोग ट्रक से शाहगंज आ रहे थे। भैया के कुछ दोस्त और मेरे मौसेरे भाई भी साथ में थे। रस्ते में ढ़ाबे से हम लोगो ने खाना लिया कुछ खाना लोगो ने  पैक करके दिया भी था। रास्ते में एक जगह पर सड़क पर पेड़ काट कर रखा गया था ,शायद  ये चोर लोगो का काम था  थोड़ा सा डर तो लगा हमे पर साथ में तीन -चार ट्रक और थे साथ ही पुलिस भी थी, सो उसने वो पेड़ हटवाये तब जा कर हम लोग आगे बढ़ पाए।

शाम को 8 -9 बजे हम  लोग निकले थे हरदोई से और सुबह क़रीब 9 -10 बजे शाहगंज पहुंचे। एक नयी जगह ,नए लोग नए तौर -तरीके आखिर ये पूर्वांचल की एक तहशील थी  जिला भी नहीं, जबकि हरदोई एक जिला था ,जब हम यहाँ आए तो यहाँ समोसा भी नहीं मिलता था न ही अच्छी  चाट मिलती थी बड़ा ढूढ़ने  के बाद पता चला की यहाँ पर शाम को कोई ठेला लगता है  समोसे का, तब जाकर समोसा मिला वो भी बहुत अच्छा नहीं था।
अच्छी मिठाई भी नहीं मिलती थी। दिवाली पर बाज़ार में मिठाई की दुकान काफी सजी हुई थी उन पर काफी अलग -अलग तरह की मिठाईयाँ थी लगा की आज कोई अच्छा मीठा खाने को मिलेगा, सभी मिठाईयों में से थोड़ी -थोड़ी मिक्स पैक करवाई जब घर पर आकर खाएं तो सब का स्वाद एक जैसा था  काफी निराशा हुई की ये कहा आ गए शहर से गांव में आखिर हरदोई जिला था और शाहगंज तहशील पर ये विकसित  हो रही थी.।

        हमे कॉमिक्स पढ़ने का शौक था वो भी यहाँ नहीं मिलती थी हमे यहाँ पर बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था
लाइट भी कम आती थी।

                                               
पहले भी एक बार नाना के यहाँ जाते समय ट्रेन से हम शाहगंज स्टेशन पर उतरे थे, तब हमें यहाँ बिलकुल  भी  अच्छा नहीं लगा था, हमने पापा से कहा था की पापा यहाँ रहने के लिए कभी मत आना हमें शाहगंज बिलकुल भी पसंद नहीं है। पर  किस्मत को शायद मेरे खिलाफ ही रहना था, जहा हम कदम नहीं रखना चाहते थे। आज हम वही पर है और अब ठीक भी लग रहा है। मैंने शाहगंज को अपने सामने विकशित होते देखा है।

सबसे अच्छा यहाँ पर दुर्गापूजा होती है जो हरदोई में नहीं मनाई जाती थी ,पहली बार नवरात्रि पर मैंने मइया  जी के  सैकड़ो पंडाल सजे हुए देखे, मुझे हरदोई में कृष्ण  जन्मास्टमी  की याद  आ गयी, मुझे काफी अच्छा लगा पंडाल काफी अच्छे बने थे और पहली बार इतने बड़े पंडाल मैंने देखे थे।

मइया जी की भक्ति की ये अदभुत  मिशाल थी।

कहानी के पिछले भाग :--

looser -1

looser-2

looser-3




story to be continue ...... 


Amit Bhardwaj

Hello ! I am Amit bhardwaj I am Post graduate(MSc.) & very ambitious person . I am a new blogger, I have started my blogging career from July 2019."The world is not what we see, the world is what we show" I hope people will like my effort. Through my blog people will get information.- “that’s my rewords”- thank you !.

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