लूज़र
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| looser33 |
ये कहानी मेरे दोस्त यानी " रोहित भरद्वाज" की है । ये एक आत्म कथा( autobiography) है। उसने जो कहानी मुझे अपनी जिंदगी की सुनाई वैसी ही मैंने पन्ने पर उतारी है। मैं कहाँ तक सफल हुआ अपने इस प्रयास में कृपया कमेंट करके बताये।
ये मेरा पहला ब्लॉग है और पहला पेजहै। जो भी गलती हुई हो उसे माफ़ करे और कमेंट द्धारा सूचित करें !
जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम सोचते है !
ये मेरा पहला ब्लॉग है और पहला पेजहै। जो भी गलती हुई हो उसे माफ़ करे और कमेंट द्धारा सूचित करें !
जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम सोचते है !
कहानी वहा से शुरू होती है जब मैं छोटा था। स्वर्ग जैसी थी मेरी जिंदगी पापा रेलवे में office superintendent थे। कोई चिंता नहीं थी। दिन भर खेलता रहता था मै। स्कूल से आने के बाद। मुझे स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था पर पढ़ने में मैं ठीक था।
गर्मी की छुट्टी हो या कोई भी छुट्टी मेरे लिए वो दिन सबसे best थे सारा दिन घर से बहार कभी अमरुद के पेड़ पर बैठ कर अमरुद खाना ये वाक़ई बहुत अच्छा अनुभव था कभी तितली , भंभीरी (dragonfly ) पकड़ना कभी रात में जुगनू पकड़ना डर भी नहीं लगता था की जिस घास मे से जुगनू पकड़ रहे है वहा पर कुछ हो न।
बचपन भी न किसी चीज का डर नहीं होता है। बारिश के मौसम में मुझे बाहर घूमना अच्छा लगता था जब आसमान में बादल छाए रहते थे और धूप जमीन पर न आती हो साथ में ठंडी हवा चल रही हो that will be a great movement in my life ,साथ ही जब बाऱिश में garden में पानी भर जाये तो उसमे कागज़ की नाँव चलाने का अपना ही मज़ा है। कभी - कभी ओले भी गिरते थे और उन्हे बीनने (collect ) में काफी मजा आता था हम लोग छाता लगा कर ओले बीनते थे।
और ठंडी के मौसम में स्वेटर पहन के बहार घूमना और मुँह से भाँप छोड़ना जैसे सिगरेट पी के धुआँ छोड़ा हो वाकई काफी मजेदार था शायद आप लोगो ने भी अनुभव किया होगा।
होली ,जन्मआष्ट्मी , दशहरा और दिवाली मेरे पसंदीदा त्योहार थे। जन्मआष्ट्मी का इन्तजार काफी बेसब्री से रहता था क्यूंकि स्कूल में छुट्टी हो जाती थी और घर के सामने पार्क था जहा पर जन्मआष्ट्मी की झांकी सजाई जाती थी।
वो एक हफ्ता मेरे लिए काफी आनंददायक था वो पार्क में दौड़ना ठेलो पर से टिक्की ,चाट खाना। उसी समय मुझे घर से निकलने की आजादी मिलती थी इसका भी कारन था बचपन में जब मैं छोटा था शायद ठीक से बोल भी नहीं पता था उस समय मेरा अपहरण हो गया था मेरा पूरा परिवार जिसमे मेरे बड़े भाई ,बहन और मम्मी -पापा थे काफी परेशान थे। काफी खोजने के बाद भी जब मैं नहीं मिला तो सभी काफी निराश हो गए। पर शायद हनुमान जी की विशेष कृपा थी की जो ढोंगी साधु मेरा अपहरण करके ले गया था वो हनुमान जी के मन्दिर के सामने गिर गया और मैं रोने लगा जिससे भीड़ इक्कठा हो गयी और वो साधु डर के भाग गया वही पास में पापा के दोस्त पान खा रहे थे वो मुझे जानते उन्होंने मुझे देखा तो गोदी में उठा लिया और घर ले आये। इस तरह से मैं वापस मिला लेकिन मेरे खोने का डर मेरे परिवार में इस तरह से व्याप्त था की मुझे अकेले बाहर जाने की परमिशन नहीं थी।
होली ,जन्मआष्ट्मी , दशहरा और दिवाली मेरे पसंदीदा त्योहार थे। जन्मआष्ट्मी का इन्तजार काफी बेसब्री से रहता था क्यूंकि स्कूल में छुट्टी हो जाती थी और घर के सामने पार्क था जहा पर जन्मआष्ट्मी की झांकी सजाई जाती थी।
वो एक हफ्ता मेरे लिए काफी आनंददायक था वो पार्क में दौड़ना ठेलो पर से टिक्की ,चाट खाना। उसी समय मुझे घर से निकलने की आजादी मिलती थी इसका भी कारन था बचपन में जब मैं छोटा था शायद ठीक से बोल भी नहीं पता था उस समय मेरा अपहरण हो गया था मेरा पूरा परिवार जिसमे मेरे बड़े भाई ,बहन और मम्मी -पापा थे काफी परेशान थे। काफी खोजने के बाद भी जब मैं नहीं मिला तो सभी काफी निराश हो गए। पर शायद हनुमान जी की विशेष कृपा थी की जो ढोंगी साधु मेरा अपहरण करके ले गया था वो हनुमान जी के मन्दिर के सामने गिर गया और मैं रोने लगा जिससे भीड़ इक्कठा हो गयी और वो साधु डर के भाग गया वही पास में पापा के दोस्त पान खा रहे थे वो मुझे जानते उन्होंने मुझे देखा तो गोदी में उठा लिया और घर ले आये। इस तरह से मैं वापस मिला लेकिन मेरे खोने का डर मेरे परिवार में इस तरह से व्याप्त था की मुझे अकेले बाहर जाने की परमिशन नहीं थी।
story to be continue ......

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