looser ( to be continue ....)-5
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जिंदगी ने लाकर वहा खड़ा कर दिया ,जहॉ मेरे लूज़र होने की कहानी गहराई में जाती यानी मैं जहा आना नहीं चाहता था। मेरी जिंदगी का लगभग फाइनल डेस्टिनेशन 'शाहगंज ' .
विकसित होती जगह और विकसित हो चुकी जगह में काफी अंतर होता है। विकसित होती जगह पर सभी तो नहीं पर ज्यादातर लोग मतलबी हो जाते है जबान के बहुत मीठे होते है पर उसके पीछे उनका मतलब छुपा होता है आखिर उन्हें भी विकसित होना होता है ,बगैर मतलब के वो आपका साथ नहीं देते , पर एक विकसित हो चुकी जगह पर मानसिकता थोड़ी विकसित होती है, और वो बगैर मतलब के भी आपका साथ दे सकते है। इसका मतलब ये नहीं है की वह कोई मतलबी नहीं होता, कुछ लोग वहा भी मतलबी होते हैं।
विकसित होती जगह पर जात -पात का भेदभाव होता है जबकि विकसित हो चुकी जगह पर जात -पात का भेदभाव नहीं होता है।
ऐसी जगह पर सबकुछ गलत ही नहीं होता ,बल्कि बहुत कुछ अच्छा भी होता है ,ऐसी जगह पर कोई रोज़गार डालना अच्छा होता है। क्यूँकि किसी भी रोज़गार के विकसित होती जगह पर विकसित होने के ज्यादा चांस होते है।
मेरा admission थोड़ा लेट शाहग़ंज आने के कारन आसानी से नहीं हो रहा था सभी स्कूलो में कोशिश कर ली पर कही पर admission नहीं हुआ फिर 'शाहगंज पब्लिक इंटर कॉलेज ' में मेरा admission हुआ। उस समय 'शाहगंज पब्लिक इंटर कॉलेज ' की स्थिति काफी ख़राब थी। क्लॉस में खिड़की दरवाजे भी नहीं थे, टीचर पढ़ाने में काफी अच्छे थे पर छात्र ठीक नहीं थे वे ज्यादातर क्लॉस में उपस्थित नहीं होते थे, मैदान में बैठे रहते थे। मैँ क्लॉस में बैठ कर पढ़ाई करता था।
एक बार एक बच्चे ने मौका पाकर मेरी हिंदी की गाईड स्कूल के पीछे ले जाकर छुपा दिया ,उसने सोचा होगा की बाद में लेकर घर चला जाऊंगा ,मैंने क्लॉस में सबसे पूँछा उससे भी जिसने चोरी की थी सबने मन कर दिया की वे नहीं जानते। लेकिन मुझे कुछ शक हो गया तो मैं स्कूल के पीछे गया और इत्तफाक से मुझे मेरी गाईड झाड़ियों के पीछे मिल गयी, तब तक मैंने देखा की एक लड़का उधर कुछ ढूढ़ने के लिए आया मेरे दोस्त ने कहा यही है वो तुम्हारी गाईड का चोर, मैंने उससे कहा यही किताब ढूढ़ रहे हो, उसने जैसे ही किताब की तरफ देखा उसका चेहरा पीला पड़ गया , मै समझ गया सच में इसी ने मेरी किताब चोरी की है। मैंने उसे कुछ नहीं कहा और मैं घर चला आया।
हाई स्कूल में पेपर के समय हमारा सेंटर खुदौली गया , 8 -10 दोस्तों ने ये तय किया कि चलो सेंटर देखकर आते है की कैसा है हम लोग साइकिल से करीब 15 k.m. दूर खुदौली गए कुछ लोगो ने वहा पेपर के समय रुकने की व्यवस्था की, फिर हमने गूजर ताल देखा।
पेपर के समय मैं सुबह 3 बजे उठता था फ़्रेश होने के बाद नास्ता करता और फिर भैया मुझे घर से एक k.m. दूर दोस्त के घर छोड़ आते, वह से जीप से मैं सेण्टर पर जाता। हम 8 -10 लड़को ने मिल कर जीप कर ली थी उसी से हम लोग पेपर देने जाते थे।
सेंटर पर एक टीचर ने मुझे काफी परेशान किया ,वो रोज-रोज मुझे कहते की तुम गलत रोल no. . पर पेपर दे रहे हो दरअशल मेरा रोल no. लास्ट में 13 था और वो मुझे लास्ट में 12 no. पर पेपर देने के लिए कह रहे थे 12 no. अनुपस्थित था। पता नहीं उन्हें क्या भ्रम था। मैंने कहा अब मैंने एक पेपर तो दे दिया है, अतः अब मैं सरे पेपर इसी रोल no. पर दूंगा भले ही मैं फेल हो जाऊ और वो पास हो जाये।
हाई स्कूल का रिजल्ट आया स्कूल में सरे लड़के फेल हो गए 3 लड़को को छोड़ कर उसमे से एक मैं भी था, सेकेंड डिवीज़न होते हुए भी कॉलेज top करने की फीलिंग आ रही थी। उसी दिन हमारा पेपर वाला रिजल्ट वाला पेपर लेकर आया हमने उससे result दिखने को कहा तो उसने कहा , क्या रिजल्ट देखोगे 3 लड़के ही पास हुए है तुम तो फेल ही होंगे, हमने पेपर देखा अपना no. पेपर में 3 लड़को में देख कर काफी खुसी हुई, हमने पेपर वाले से कहा हां हम तो फेल है। वो चला गया। उसने पैसे भी नहीं लिए, पर जब उसे पता चला तो अगले दिन उसने कहा- तुम ने बताया नहीं तुम पास हो, मैंने कहा -आप ने कहा तुम फेल ही होंगे तो मैंने आपका मन रख लिया। वो बेचारा कुछ बोल नहीं पाया।
इस तरह मेरा हाई स्कूल complete हुआ।
कहानी के पिछले भाग :---
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story to be continue ......

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