looser ( to be continue ....)-9
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कभी -कभी भाग्य और समय आपको सही दिशा दे रहे होते है पर आप उसे इग्नोर कर देते है ,बाद में वहीं भाग्य और समय आपको इग्नोर कर देता है। तब एक समय के बाद एहसास होता है मैंने क्या गलत किया।
ग्रेजुएशन के समय मेरी कुछ दोस्तो से शर्त लग गयी की ग्रेजुएशन में B.sc. तीनों साल हिंदी में पेपर दे कर दिखाओ मैंने भी शर्त स्वीकार कर ली और और हिंदी बुक्स खरीदी ,हिंदी सीरीज भी मगायी ,हिंदी में बुक्स मिलना थोड़ा मुश्किल था पर मैंने आर्डर पर उन्ही राइटर की बुक्स मगायी जो क्लास में बोला गया था ,मैंने स्टडी आरम्भ की क्लास में इंग्लिश में पढ़ता और घर पर हिंदी में। मैंने प्रैक्टिकल इंग्लिश में दिए और पेपर हिंदी में ।
1st year में जब मैं हिंदी में पेपर दे रहा था, टीचर मेरे पास आते ये देखने की कोई नक़ल तो नहीं कर रहा पर मुझे हिंदी में लिखता देख कर मुझसे दूर चले जाते पूरे क्लास को चेक करते पर मुझे नहीं।
जिनसे मेरी शर्त लगी थी इत्तफाक से उनमे से एक-दो दोस्त मेरे पीछे ही बैठे थे, उन्होंने कॉपी दिखने को कहा मैंने भी कॉपी दिखा दी, वो बोला यार तू तो हिंदी में लिख रहा है, मैंने कहा शर्त तो यही थी उसने कहा ''प्लीज यार इंग्लिश में बता दे'' , मैंने कहा ''पर मैंने स्टडी हिंदी में की है '' उसने अपना माथा पकड़ लिया।
टीचर को उस पर कुछ शक़ हुआ उन्होंने उससे पूंछा,'' तुम उससे नक़ल कर रहे हो'' उसने कहा ,''नहीं सर वो तो हिंदी में लिख रहा है'' इतना सुनते ही टीचर ने उसे खड़े कर के एक झापड़ लगाया और बोले ,''तुम उसकी कॉपी नहीं देख रहे हो तो तुम्हे कैसे पता है की वो हिंदी में लिख रहा है '' वो बेचारा अपना सा मुँह ले कर बैठ गया।
final year में उसने मुझसे माफ़ी मांगी और बोला ,''फाइनल ईयर में हिंदी में पेपर मत दो, इंग्लिश में दो नहीं तो फेल हो जाओगे '' मैंने कहा ,''अब चाहे फेल हो या पास मैं पेपर शर्त के अनुशार हिंदी में ही दूंगा '' उसने कहा, 'धत तेरे की फिर मैं तेरे से देख कर नहीं लिख पाउँगा।'
मैंने शर्त के अनुशार फाइनल ईयर में भी हिंदी में पेपर दिए और अच्छे no.से पास हुआ।
मेरे दिमाग़ में डॉ. बनने का फितूर सवार था सायद इसीलिए मैंने science साइड ली थी। मैंने 4 -5 बार C. P. M.T. TRY किया पर नहीं निकाल पाया मेरे परिवार को मुझ पर भरोसा था की मैं अवस्य निकल जाऊंगा पर मैं उनका विस्वास कायम न रख सका।
मेरे भैया के दोस्त जो मॉस्टर थे मुझे B.ed.करने के लिए काफी कह रहे थे। वे चाहते थे की मैं B.ed. करके टीचर बन जाऊ जो उस समय आसान था मैं आसानी से टीचर बन जाता, पर उस समय टीचर की सैलरी कम थी और मेरा मन डॉ. बनने का था सो मैंने उनकी बात नहीं मानी, आज अफ़सोस होता है की काश मैंने उनकी बात मानकर B.ed.कर लिया होता तो आज मैं लूज़र न होता। आज मैं डॉ. नहीं बन पाया तो कम से कम टीचर तो होता।
मैंने नासमझी में अपना भग्य ठुकराया, जिसका नतीजा मुझे आज भुगतना पड़ रहा है।
'' जिसे पाने की चाह थी ,वो कब मेरे साथ थी ,
जो साथ थी , उसकी कब मुझे चाह थी।''
मैंने कही पेपर में पढ़ा था।,किसी ने कहा था की आपका 'good luck ' 75 % आपके साथ होता है और आपका 'bad luck ' 25 % आपके साथ पर फिर भी ज्यादातर लोग 25 %'bad luck ' की तरफ चले जाते है और सफल नहीं हो नहीं हो पाते।
शायद ये बात सच है क्यूँकि मेरी जिंदगी में भी हमेशा हर मोड़ पर दो रास्ते थे, जिनमे से एक रास्ता मुझे winner बनाता और दूसरा looser और मैंने हमेशा लूज़र वाला रास्ता चुना। पर जब मैंने लूज़र वाला रास्ता चुना तो मुझे यही लगता था की मैं जरूर winner बनूँगा , पर शायद ये बात सच थी इसीलिए मैंने 75 %वाला रास्ता छोड़ कर 25 % वाला चुना क्यूँकि मेरी किस्मत में ये नियम लागू होना था।
जिंदगी में कोई भी ये नहीं सोचता है की वो लूज़र बने, हर कोई winner बनना चाहता है, मैं भी winner बनना चाहता था पर समय और किस्मत ने मुझे लूज़र बना दिया।
B.sc. कम्पलीट करने के बाद मैंने कई काम करने की कोशिश की मुझे कही भी सफलता नहीं मिली। मैं कहाँ करता था की "एक दिन किस्मत भी हार जाएगी मुझे हराते -हराते और मैं जीत जाऊंगा '' पर ऐसा नहीं हुआ।
मेरी मम्मी मुझसे कहती की बेटा किसी कम्पटीशन की तैयारी कर लो थोड़ा पढ़ लो pcs का फॉर्म डाल दो,
कोशिश की पर वहां भी नहीं सफल हो पाया।
मेरी मम्मी चाहती थी की मैं सफल हो जाऊ, धीरे -धीरे वो बीमार रहने लगी और एक दिन उन्होंने ये दुनियाँ छोड़ दी, वो मुझे छोड़ कर जा चुकी थी, मैं काफी टूट चूका था, उनकी बहुत याद आती थी। अपने परिवार को टूटने से बचाने के लिए मैंने अपने को सम्हाला।
पापा भी बीमार रहने लगे थे, मुझे काफी हिम्मत देते थे शायद उन्हें एहसास था की मैं अंदर से काफी टूट चूका हूं ,वो मेरी शादी की बात करने लगे, मैंने उन्हें काफी समझाया की पापा अभी नहीं पहले मुझे सफल होने दो, पर वो नहीं माने और उन्होंने मेरी शादी तय कर दी।
पापा ने एन्गेजमेन्ट के लिए डायमंड रिंग मॅगाई थी, वो जैसे कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते थे जिससे मुझे ये न लगे की मैं बेकार हूँ।
मेरी शादी से कुछ दिन पहले उनकी तबियत काफी ख़राब हो गयी थी, मैं काफी डर गया था। फिर उनकी तबियत कुछ ठीक हुई तो शादी की तैयारियां होने लगी।
सभी परिवार वाले, रिश्तेदार कफी खुश थे, काफी धूमधाम से मेरी बारात निकली, जयमाल के बाद जब शादी हो रही थी , फेरो के समय मेरे पापा की तबियत अचानक काफी ख़राब हो गयी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था मेरा मन पापा के पास जाने को कर रहा था और वो इशारे से मुझे फ़ेरे लेने को कह रहे थे। अजीब स्थिति थी। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। जैसे-तैसे फेरे पूरे हुए, पापा की तबियत में थोड़ा सा आराम जरूर था पर अभी वो ठीक नहीं थे।
शादी हो गयी हमने उनका आर्शिवाद लिया वो काफी ख़ुश थे।पापा को मैरेज हॉल के एक रूम में लिटाया गया था,सुबह विदाई के बाद सब लोग घर आ गए। कुछ रिश्तेदार जाने लगे तो पापा उन्हें छोड़ने दरवाजे तक जा रहे थे जैसे वो ठीक हो गए हों।
सब कुछ ठीक चल रहा था।नयी बहु के आने से वो खुश थे। हमारी शादी को अभी एक महीना भी नहीं हुआ था की पापा की तबियत फिर खराब हो गयी ,हमने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की पर हम उन्हें बचा न सके और वो हमे छोड़कर चले गए। जैसे मेरी जिंदगी ही ख़त्म हो गयी, मैं फिर से टूटने लगा अभी मम्मी को गए एक साल भी नहीं हुआ थ , और पापा भी चले गए।
परिवार न टूट जाये इसलिए फिर मैंने अपने आप को सम्हाला।
ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरी शादी देखने के लिए ही रुके थे, जैसे उन्हें सब पता था, मेरी जिंदगी में वो एक अध्याय जोड़कर वो चले गए।
पापा चाहते थे की मैं सफ़ल हो जाऊ, पर मैं न हो सका। पर अब मैं दिल से सफ़ल होना चाहता हूँ मैं मम्मी -पापा की इच्छा पूरी करना चाहता हूँ और जो टैग किस्मत में मुझ पर looser का लगाया है उसे मैं बदलकर winner का करना चाहता हूँ।
'' i wish i am winner ,not a looser !''
to be continue ................winner !
कहानी के पिछले भाग :--
1- LOOSER-1
2- LOOSER-2
3- LOOSER-3
4- LOOSER-4
5- LOOSER-5
6- LOOSER-6
7- LOOSER-7
8- LOOSER-8

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