looser ( to be continue ....)-6
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| looser 33 |
जिंदगी कभी-कभी आपको वो दे देती है जो आप सोचते भी नहीं हो और जब आपको चाहिए तो नहीं मिलता लेकिन हम समझे न समझे उसकी टाइमिंग सही होती है।
हाई स्कूल पास करने के बाद मैंने saint thomas कॉलेज में एडमिशन लिया।
saint thomas में पब्लिक इंटर कॉलेज के बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता था पब्लिक कॉलेज की इमेज काफी ख़राब थी पर चूँकि 3 लड़के ही पास हुए थे इस लिए मुझे और पब्लिक कॉलेज के एक लड़के को और एडमिशन मिला पर ऐसे ही मुझे एडमिशन नहीं मिला मेरा एंट्रेंस एग्जाम हुआ उसमे मै पास हुआ तब जाकर मुझे एडमिशन मिला।
मैंने इंटरमीडिएट के कोर्स को काफी हैवी ले लिया ले लिया जिससे 1-st ईयर में मुझे काफी कम no. मिले
मैं काफी निराश हो गया। फिर मुझे किसी ने सलाह दी की कोचिंग कर लो और मैंने कोचिंग कर ली हा सच में मुझे काफी हेल्प मिली। मेरे अंदर आत्मविस्वाश आ गया की अब मैं अच्छे से कोर्स को कवर कर सकता था।
वाकई मैंने जहा कोचिंग की वो कोर्स को इस तरह से समझाते की पूरा कोर्स समझने और याद करने में आसान हो जाता था। मेरे ख्याल से बच्चे कोई कमज़ोर नहीं होते बस उन्हे समझाने के तरीके अलग -अलग होते है जिससे की कोई बात उनकी समझ में आ सके।
जंतु विज्ञानं के प्रैक्टिकल में एक दिन केचुए की किडनी( septal nephridia ) निकाल कर स्लाइड बना कर दिखानी थी। मैंने जो स्लाइड बनाई वो बहुत अच्छी बनी। टीचर काफी ख़ुश हुए और उन्होंने वो स्लाइड पुरे क्लास को दिखयी। ऐसा लग रहा था की जैसे मैंने कोई अवार्ड पाया हो ,सर बोले ' तुमने जो स्लाइड बनायीं है वो रिकॉर्ड में रखने वाली है पर ये स्लाइड temporary है, नहीं तो इसे रिकॉर्ड में रखता, क्यूँकि ऐसी स्लाइड रिकॉर्ड में भी नहीं है '
सर मुझे अच्छी तरह से जान गए उन्हें मेरा नाम भी याद हो गया जिसका फायदा मुझे 'प्रैक्टिकल एग्जाम' में हुआ मुझे 'प्रैक्टिकल एग्जाम' में अच्छे no. मिले।
इण्टर पेपर के समय मैंने बहुत आत्मविस्वाश के साथ पेपर दिया मैंने पूरा कोर्स पढ़ रक्खा था इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं थी ,मैंने जो भी पढ़ा वही सब पेपर में आया और इंटरमीडिएट में मैं अच्छे नम्बरों से पास हुआ।
इण्टर में मेरे दो बहुत ही बेस्ट फ्रेंड थे 'प्रत्युष शुक्ला और विश्वजीत प्रताप सिंह ' जिसमे से विश्वजीत प्रताप सिंह के पापा का ट्रांसफर हो गया और प्रत्युष काफी समय तक मेरे साथ रहा फिर इंजीनियरिंग की तैय्यारी के लिए दिल्ली गया। वह से फ़ोन से बात होती थी,इधर उसके पापा ने वाराणसी में मकान बना लिया उसका फ़ोन खो गया ,फिर मेरा उसका कोई कांटेक्ट न रहा।
. आज भी उसकी याद आती है ,कही खो गया वो। लेकिन एक दिन मैं उसे ढूढ़ लूंगा ,मुझे विश्वास है।
कहानी के पिछले भाग :--
1- looser-1
2- looser-2
3- looser-3
4- looser- 4
5- looser- 5
story to be continue ......

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